सोमवार, 20 मार्च 2023

जय श्री राम... अब दिन दूर नहीं

श्री राम मंदिर, अयोध्या के पूरे होने में अब आठ महीने ही बाकी हैं। जो कहते थे कि मंदिर वहीं बनाएंगे, पर तिथि नहीं बताएंगे। उनके लिए नरेंद्र मोदी की सरकार ने बड़ा उदाहरण दे दिया है।




रविवार, 2 मार्च 2014

पुन: स्वागत है हिंदू ह्रदय सम्राट

नरेंद्र भाई मोदी सोमवार  मुजफ्फरपुर में रैली •ो संबोधित •रने आएंगे। पिछले छह महीने •े अंदर यह दूसरा मौ•ा होगा, जब वे रैली •रने बिहार आ रहे हैं। आशा है •ि पिछली बार •ी गांधी मैदान, पटना •ी हुं•ार रैली •ी तरह उन्हें •टु अनुभव से नहीं गुजरना होगा और राज्य सर•ार सूबे •ो शर्मिंदा नहीं होने देगी। ऐसा मैं इसलिए लिख रहा हूं •ि क्यों•ि ए• पत्र•ार होने •े नाते मैं रैली में उन•ा भाषण सुनने •े लिए गया था और मेरा अनुभव •टु व पीड़ादाय• रहा था।
२८ अक्तूबर •ो हुई रैली में मैं उन्हें सुनने •े लिए गांधी मैदान गया था।  घर से नि•ला तो माहौल ठी•-ठा• था, •िंतु रैली स्थल गांधी मैदान जाते-जाते माहौल •ाफी खराब हो चु•ा था।  मेरे ए• दोस्त ने फोन •र बताया •ि भई गांधी मैदान मत जाना । इस पर मैंने उनसे पूछा •ि क्यों क्या बात हुई, चलना तो आप•ो भी था और आप ऐसी बात •र रहे हैं। इस पर उन्होंने •हा •ि पटना स्टेशन पर बम फटे हैं, टीवी पर खबर चल रही है •ि और बम मिले हैं। इस पर मैंने •हा •ि मैं तो उन्हें सुनने जाऊंगा ही। मित्र महोदय से मोबाइल पर बात •रते-•रते मैं उद्योग भवन •े समीप पहुंच गया। तभी आरबीआई छोर पर जोरदार धमा•ा हुआ और धुंए •ा ऊंचा गुबार उठा। मन थोड़ा डरा पर इरादा नहीं। मैं पैदल चलते-चलते रैली स्थल पर बनी मीडिया गैलरी त• पहुंच गया, तब शायद दो या तीन और धमा•े हुए। मीडिया गैलरी पूरी भरी थी सो मैंने तय •िया •ि नई गांधी मूर्ति •े पास खड़े हो•र उन•ा भाषण सुना जाए। रैली में आए लोगों में सुरक्षा इंतजामों •ो ले•र गुस्सा तो था, पर फट रहे बमों •े बीच वे अंतिम त• बने रहे क्यों•ि मेरी याद •े हिसाब से मोदी ही अंतिम वक्ता थे। मैंने उन•ा पूरा भाषण सुना और फिर पैदल अपने अखबार •े दफ्तर पहुंचा। साथियों •ो अपनी लाइव रिपोर्ट बताई। रैली •ा सार बताया। हालां•ि तब त• रैली में आतं•ी घटना •ी बात सामने नहीं थी ले•िन अगले घंटे भर में यह साफ हो गया •ि रैली व उस•े आस-पास फटनेवाले बम शरारती तत्वों •े सुतली बम नहीं बल्•ि आतं•ियों •े बम थे। इस खबर ने पूरे पटना •ो सन्न •र रख दिया •ि राज्य •ी नीतीश सर•ार आखिर •र क्या रही थी।  फिर तो रैली •े बाद भी गांधी मैदान में दो-तीन दिनों त• बम मिलते रहे व राज्य सर•ार •ी नामा•ियों •े •ारण सूबे •ी जनता शर्मिंदा होती रही।
खैर, यह सब पुरानी बातें हैं। आशा है •ि मोदी जी देश व बिहार •ो ले•र खा•ा प्रस्तुत •रेंगे व यहां से ४० सीटों पर अजेय जीत •ा आशीर्वाद ले•र जाएंगे।  देश व राज्य •ो •थित सुशासन से मुक्ति दिलाना बहुत जरूरी हो गया है। ऐसे में मोदी जी ही देश •ी पहली व आखिरी उम्मीद हैं।

शनिवार, 11 जनवरी 2014

अच्छे दिन तो आ ही रहे हैं

मोदी ने कहा है कि देश के अच्छे दिन आनेवाले हैं। सच ही कहा है चार राज्यों के विधनसभा चुनावों में कांग्रेस को जनता उसका हिसाब किताब दिखा चुकी है और रही सही कसर केजरीवाल की आप ने पूरी कर दी है। अब जो हालात बने हैं उसमें तो तय हैं कि देश में अब डमी सरकार नहीं चलेगी। न ही कोई इंटर्न नेता देश का प्रधानमंत्री बनने की सोचेगा।

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

छठ तो ठीक है, पर गंगा को क्यों भूले

रोहित कुमार सिंह
छठ बिहारियों के लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह बताना शायद समय बरबाद करने
जैसा है. बिहार का यह पहला व आखिरी लोकपर्व है जो तमाम तरह के बदलावों के
बावजूद अपने संपूर्ण आदि रूप में है. यानी सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक;
किसी तरह का बदलाव इसे प्रभावित नहीं कर पाया. गीतों की पवित्नता से लेकर
आस्था तक सबकुछ अक्ष़्क्षुण है लेकिन एक बात जो बदल गयी वह यह है कि हमने
अपनी निदयों की पवित्नता का ध्यान नहीं रखा. नतीजा जिस गंगा घाट पर छठ
करने को महान धार्मिक कृत्य बताया गया था, आज गंगा घाटों पर गंगा से
ज्यादा गंदगी दिखती है. गंगा की जमीन पर खेती हो रही है, घर (अपार्टमेंट)
बन रहे हैं, बची कसर हम प्लास्टिक, प्लास्टर ऑफ पेरिस व वैसी चीजें गंगा
में फेंक कर पूरी कर रहे हैं, जो सदियों में नष्ट नहीं होती हैं.
दो दिनों की गंगा
लोगों को गंगा अब दो ही दिन याद आती है एक; जब छठ करने के लिए गंगा जल
लाना हो तब या फिर अर्घ देने के वहां जाना हो तब. दूसरा; तब जब किसी
परजिन की अंतेष्टि उसके तट पर करनी हो. पिछले साल देश स्तर का एक आंकड़ा आया
है कि गंगा को गंदा करने (मकसद सफाई था) के नाम पर दो दशकों (लगभग 20
साल) में हजारों करोड़ रु पये नेताओं, इंजीनियरों, ठेकेदारों आदि की जेब
में चले गये. .और इन वर्षो में गंगा की क्या हालत हुई किसी को बताने की
जरूरत नहीं है.
खुद ही बरबाद कर रहे विरासत
मेरे एक मुसलिम मित्न ने मुझसे कहा कि अगर किसी धर्म या समुदाय की
सांस्कृतिक धरोहर, परंपरा या विरासत आदि बरबाद होती है तो उसके लिए वह
स्वयं जिम्मेदार होता है. गंगा की ताजा हालत के संदर्भ में मुङो उसकी यह
बात 100 प्रतिशत सही लगती है. जरा सोचिए जिसके माथे गंगा की सफाई का
जिम्मा रहा होगा, उनमें 90 प्रतिशत तो हिंदू ही रहे होंगे. लेकिन उन
लोगों ने हजारों करोड़ हजम कर गंगा को नाला बनने के लिए उसके हाल पर छोड़
दिया.
एक कोशिश गंगा के नाम
आज गुरुवार है व तारीख है 7 नवंबर, 2013. शुक्रवार की शाम हम अपने परजिनों के साथ
छठ मैया को अर्घ देने के लिए गंगा घाटों पर जरूर जायेंगे. क्या हम हिंदू
होने के नाते कुछ चीजें कर सकते हैं. मसलन, क्या छठ के दिन हम यह प्रण
लेंगे कि हम निदयों में पॉलीथीन, प्लास्टर ऑफ पेरिस आदि नहीं डालेंगे,
गंगा को गंदा करने का कोई काम नहीं करेंगे. विश्वास मानिए
खुद से की गयी पहल ही गंगा को ‘गंगा मैया’ बना सकती है. सदियों से जिसने
हमारी पीढ़यिों का पोषण किया है उसके लिए तो हम इतना कर ही सकते हैं. आप
एक साल ऐसा करिए, यकीनन अगले साल आपको फर्क जरूर दिखेगा.
सभी दोस्तों को छठ पर्व की शुभकामनाएं व बधाईयां. सभी पर भगवान भास्कर व
छठ मैया की कृपा बनी रहे.

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

पटना की रैली में मोदी शब्दश:

भारत माता की जय. भाजपा की यह महारैली नहीं है. यह तो भारत की महाशक्ति का अनुष्ठान है. वीर कुंवर सिंह के धरती के प्रणाम. देश में कउनो परिवर्तन बिहार के माटी के बिना संभव नइखे. भारत के जो स्वर्णिम इतिहास बा उ पूरा के पूरा बिहार से बा. चाहे नंद वंश के काल होखे, मौर्य वंश के काल होखे या गुप्त वंश के काल.
बिहार ओहे भूमि हई जहां सूर्य के देव के रूप में पूजा होव हइ. सूर्योदय के पूजा होव हइ, सूर्यास्त के पूजा होव हइ. बिहार के लोग अवसरवादी न होखेला, कुछ अपवाद के छोड़ के. मैं जानता हूं आप क्या सुनना चाहते हैं.
बिहार क समस्या कर जड़ सीमांचल छइ.पूरा मिथिलांचल बाढ़ से त्रस्त रहइ छइ, कुसहा कर समस्या कर समाधान हो जइतइ त बिहार खुशहाल भ-जैतइ.
भाइयों और बहनों, अगर रामायण काल की याद करें तो माता सीता की याद आती है. महाभारत काल की याद करें तो कर्ण की याद आती है. गुप्तकाल में चंद्रगुप्त की राजनीति प्रेरणा देती है. वैशाली का गणतंत्र भी याद आता है. आज राजा अशोक के बाद कोई सम्राट नजर नहीं आता. पाटलिपुत्र में पटना की गली-गली याद आती है. नालंदा की बात करें तो विक्रमशिला और..की याद आती है.
    भाइयों और बहनों, देश की आजादी के दो पड़ाव हुए. पहला गांधी का चंपारण सत्याग्रह और दूसरा गुजरात में डांडी यात्र.
    ये हुंकार हिंदुस्तान के करोड़ों लोगों की है, जो बिहार से उठा है. ये सीता माता की भूमि है और मैं जब स्मरण करता हूं- जब माता सीता का अपहरण हुआ था तो सारे वानर उन्हें खोजने चले थे. उनको कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. कहां जाये, कैसे जाये, कैसे खोजे. सभी अधर में थे. तभी जामवंत की नजर हनुमान पर गयी. जामवंत ने हुनमान से उनके पूर्वजों की शक्ति का एहसास कराया और कहा- पवन तनय बल पवन समाना, काज चुप साधि रहेहु बलवाना. ये हुंकार रैली भी यही मंत्र है. देश हुंकार करना चाहता है. देश को प्रेरणा देने का काम बिहार की धरती से हो रहा है. बिहार की विशेषता है कि जब-जब देश को इसकी जरूरत पड़ी, बिहार ने दिया है. गौतम बुद्ध की जरूरत थी तो बुद्ध ने दिया, महावीर की जरूरत थी तो महावीर ने दिया, गुरु गोविंद सिंह की जरूरत थी तो गुरु गोविंद सिंह को दिया. जब देश भ्रष्टाचार में डूब रहा था,तब यही बिहार है,जिसने जय प्रकाश नारायण को दिया था. भाइयों और बहनों मैं भाग्यशाली नहीं हूं, जिसे जेपी की उंगली पकड़ने का मौका मिला, लेकिन मैं अपने आप को भाग्यशाली मानता हूं कि मुङो उनकी चरणों में अंगूठे के पास बैठकर सीखने वालों के साथ काम करने और सीखने को मिला है. यहां पर हमारे मित्र मुख्यमंत्री हैं (नीतीश का नाम लिये बिना). यहां के सीएम हमारे मित्र हैं. मेरे जानने वालों ने मुझसे पूछा आपके मित्र ने आपको क्यों छोड़ दिया? मैंने कहा कि जो जेपी को छोड़ सकता है, वो बीजेपी को क्यों नहीं छोड़ सकता. भाइयों और बहनों राम मनोहर लोहिया ने देश को कांग्रेस से छुड़ाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. अपना जीवन दे दिया, लेकिन उनके चेलों ने क्या किया, उनकी पीठ पर खंजर घोपा है. जयप्रकाश और लोहिया की आत्मा उन्हें कभी माफ नहीं करेगी. 2006-07 की घटना है. हमारे मित्र मुख्यमंत्री (नीतीश कुमार) गुजरात आये थे. कथा सुनोगे ? ( कार्यकर्ताओं की आवाज आयी- सुनेंगे), तो चलो ठीक है.. हमारे मित्र मुख्यमंत्री शादी समारोह में आये, हम भी गये थे. एक टेबल पर खाना आया. उन्हें इतना खिलाया-ढोकला खिलाया, गुजराती दाल और गुजराती कढ़ी खिलायी,             कई तरह की मिठाइयां खिलायी.                 पेट और मन उनका दोनों भर गया. मेहमान नवाजी करना हमारे देश की परंपरा है भई.
    सार्वजनिक जीवन के चरित्र होते हैं. लालू प्रसाद मुङो गाली देने का कोई मौका नहीं छोड़ते. कहते थे मोदी को पीएम बनने नहीं दूंगा. लालू जी की अकस्मात तबीयत बिगड़ी. मैंने लालू जी को फोन किया. उनका हाल-चाल पूछा. मैंने मीडिया को कुछ नहीं बताया, मैंने सोचा पर्सनल बात है. इसको मीडिया को क्या बतायी जाये. पर लालू जी ने मीडिया को बुलाया. मीडिया से उन्होंने कहा कि मैं जिसको गाली देता हूं, देखो वो मुङो फोन करता है. लालू जी यदुवंश के राजा कृष्ण द्वारिका में ही बसे थे. आपको कुछ हो जाये तो हमारी चिंता स्वाभाविक है. मैं द्वारिका से आशीर्वाद लेकर आया हूं. अब आपकी (यदुवंशी समाज) चिंता करने का जिम्मा लेता हूं. कृष्ण के काम को हम सब मिलकर करेंगे.
    भाइयों और बहनों, साल में एक-दो बार मुख्यमंत्रियों की बैठक प्रधानमंत्री करते हैं. लंच भी होता है. पांच-छह मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के साथ एक ही टेबल पर बैठे थे. खाने की प्लेट लगी थी. भोजन परोसा जा रहा था, लेकिन मेरे मित्र मुख्यमंत्री खाना छोड़ इधर-उधर देख रहे थे. मैं कभी प्रधानमंत्री को देख रहा था,तो कभी अपने मित्र मुख्यमंत्री को. मुझसे रहा नहीं गया, मैंने कहा- कोई कैमरे वाला नहीं है, खा लो. हिपोकसी की भी सीमा होती है. बिहार की जनता यह न भूले. भाजपा के वसूल को समङों.
    भाइयों और बहनों, जिस समय बिहार में जंगलराज से मुक्ति का अवसर आया भाजपा के विधायक जदयू से अधिक थे. भाजपा के सुशील कुमार मोदी मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन बीजेपी के लिए दल से बड़ा देश होता है. पार्टी ने अधिकार की बली चढ़ा दी. हफ्ते भर में सरकार गिर गयी थी. उसके बाद गंठबंधन की सरकार बनी. अर्थशास्त्री व राजनीतिक पंडितों को मैं आह्वान करता हूं कि जब तक सरकार चली. भाजपा के मंत्रियों ने ही विकास किया,अच्छा काम किया. एक बार सवाल आया कि बिहार में फिर दो-दो चुनाव हुए, मोदी को चुनाव प्रचार के लिए लाया जाये या नहीं. हर नेता का प्यार था कि वे बिहार लाने के लिए आग्रह कर रहे थे. सुशील कुमार मोदी, नंद किशोर जी ने फोन किया, कैलाशपति मिश्र ने आग्रह किया, गिरिराज सिंह का अनुरोध और अश्विनी चौबे का आदेश भी आया. गठबंधन जाने का भी खतरा था. मैंने कहा- हमें ले जाने का आग्रह न करें. बस जंगल राज दोबारा नहीं आना चाहिए. नरेंद्र मोदी बिहार में न जाए कोई बात नहीं, लेकिन जंगल राज नहीं आना चाहिए. इसलिए हमने अपमान सहना पसंद किया. पर हमारे मित्र मुख्यमंत्री का इरादा नेक नहीं था. उनके चेलों ने उन्हें सलाह दी कि कांग्रेस से जुड़ जाओ. प्रधानमंत्री बनने का अवसर है. वे ख्वाब देखने लगे. यह भाजपा के साथ विश्वासघात नहीं है, यह विश्वासघात बिहार की कोटी-कोटी से है.विश्वासघात आपके साथ किया है. विश्वासघात करने वालों को सजा देनी है, उखाड़ना है. उन्हें साफ करना है.
बहनों और भाइयों गांधीजी ने चंपारण में अंगरेज मुक्त भारत की बात कही थी. उसी तरह पटना के इस गांधी मैदान से हम कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार करेंगे. ऐसा हम यहां से संकल्प लें. कल टीवी देख रहा था. कांग्रेस के मित्र परेशान हैं. नींद नहीं आ रही है. बेचैन हैं. कह रहे हैं मोदी शाहजादा क्यों कह रहा है.अगर उन्हें मेरे शाहजादा कहने पर ऐतराज है तो हमें शाहजादा कहने की नौबत क्यों आयी. अगर आपको बुरा लगता है तो आप वंशवाद, परिवारवाद छोड़ें. हम शाहजादा कहना छोड़ देंगे.  जयप्रकाश नारायण लोकतंत्र के लिए जीये, जूझते रहे, जेल में भी रहने को तैयार हो गये.
    लोकतंत्र के चार दुश्मन हैं.पहला परिवारवाद-वंशवाद,दूसरा जातिवाद का जहर,तीसरा संप्रदायवाद और चौथा अवसरवाद यानी मौकापरस्ती. देश को दुर्भाग्य है कि बिहार की राजनीति में सभी चीजें उभर कर आ गयी हैं. चारों चीजें यूपीए के राज में उभरी है. भारत सरकार के दस साल पूरा होने को है. शुरू में ही यूपीए ने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाया. घोषणा हुई कि 100 दिन में महंगाई कम कर देंगे. महंगाई कम नहीं हुई. महंगाई और बढ़ी. अब उनको घर भेजने की तैयारी है. अब यूपीए को उखाड़ फेंकने की बारी है. मैं यूपीए को आह्वान करता हूं कि 2004 व 2009 में सरकार बनायी. देश की भलाई की बात कही, लेकिन 100 दिन के काम करने की घोषणा में 80 फीसदी भी काम नहीं किये गये. क्या देश की जनता उसे माफ करेगी? गंगा की सफाई की बात कही थी. साफ नहीं हुआ. बीमारियों का घर गंगा का तट बन चुका है. रोजगार देने का वादा किया था. क्या रोजगार मिला? गरीबी बड़ी समस्या है. महंगाई के कारण चूल्हा नहीं जलता है. बच्चे रोते-रोते सोते हैं. मां आंसू पिला कर सुलाती हैं. किसान भी महंगाई से मर रहे हैं. किसान को खाद नहीं मिल रहा है और बरौनी कारखाना में ताला लटका हुआ है. देश का नुकसान हो रहा है पर सरकार को इसकी परवाह नहीं है.
    केंद्र सरकार की ओर से 20 सूत्री कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. इसे लागू करने वाले पहले पांच राज्यों में भाजपा शासित राज्य हैं. गरीबों की बात करने वाले मेरे मित्र का राज्य बिहार का नंबर 20 वें पायदान पर है. गरीबों का मजाक उड़ा रहे हैं. योजना आयोग 26 रुपये रोज कमाने वालों को गरीब नहीं मानती है. 26 रुपये में तो एक परिवार के लिए चाय भी नहीं मिलती है.कांग्रेस के एक नेता तो 12 रुपये में ही खाना की बात करने लगे. गरीबी क्या है. उन लोगों को पता नहीं है. हमने गरीबी देखी है. गरीब घर में पैदा हुए हैं. बचपन गरीबी में ही बीती. बिहार ने ढेर सारे रेल मंत्री दिये. मैं तो रेल मंत्री का सपना नहीं देखता हूं. मैं रेल डिब्बे में चाय बेचा करता था. कितनी मुसीबत होती थी. टीटीइ व गार्ड को मैनेज करना पड़ता था. मंत्री तक को भी रेल के बारे में  इतनी जानकारी नहीं होगी जितनी मुङो जानकारी है. संप्रदाय को भड़काने का काम राजनेताओं ने किया है. जातिवाद व संप्रदायवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है. चाणक्य का काल स्वर्णिम काल था. छोटे-छोटे राज्यों को भी जोड़ा जाता था. एक होने पर जोर था, लेकिन कांग्रेस ने विभाजन का नारा दिया. जातिवाद को बढ़ावा दिया. जाति के अंदर भी जाति पैदा की. बिहार में फिर से स्वर्णिम काल को लाना है तो हम जोड़ने से आगे बढ़ेंगे, तोड़ने से नहीं. हर जाति-समुदाय को जोड़ना है तभी आगे बढ़ेंगे. जब सिकंदर आया तो विश्व जीत कर आया. इसी बिहार की धरती ने उसे परास्त किया और मार भगाया. इसी भूमि पर वे वीर पैदा हुए थे. वीरों के गौरव की धरती बिहार रही है. हिंदुस्तान की रक्षा करते-करते बिहार के चार जवान शहीद हुए. पाकिस्तान ने चार जवानों को मार गिराया. हिंदुस्तान का हर बच्च शहीद से प्रेरणा लेता है. गौरव करता है तो बिहार के एक मंत्री कहते हैं कि सेना में शहीद होने के लिए ही जवान जाता है. डूब मरो-डूब मरो. यह अपमान सहन करोगे. इनको हमेशा के लिए ऐसा सबक दो कि देश के जवानों की शहादत पर कभी भी कीचड़ न उछालें. मुझ पर चारों ओर से कीचड़ उछाला जा रहा है. कीचड़ उछालने वालों, जितना कीचड़ उछालोगे. कमल उतना ही खिलेगा. विश्वास के साथ आगे बढ़ना है. यही संकल्प लेकर आगे बढ़ना है.
    यह ऐतिहासिक रैली नहीं है. नये इतिहास की नींव रखने वाली रैली है. एक नये विश्वास, नयी उमंग के साथ हम आगे बढ़ें. यह संकल्प लें. बिहार भाजपा ने केंद्र से 50 हजार करोड़ का पैकेज मांगा है. दिल्ली दे या न दे, 200 दिन का सवाल है. बिहार को पैकेज मिलना चाहिए. जो प्यार बिहार ने दिया है, पलक पांवड़े बिछाया है. मुङो नहीं लगता है कि हिंदुस्तान के किसी नेता को ऐसा  सौभाग्य मिला होगा. मैं उसे ब्याज के साथ चुकता जरूर करूंगा. हमारा मंत्र है विकास. सारी जाति का विकास. मुसलिम भाई हज यात्र पर जाते हैं. भारत सरकार ने कोटा तय कर रखा है. गुजरात से 4800 और बिहार से सात हजार से कुछ अधिक. मेरे मित्र के राज्य बिहार से मुश्किल से छह हजार लोग ही हज यात्र पर जा पाते हैं.आवेदन ही नहीं आते हैं. कारण, गरीब मुसलमानों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वे हज यात्र क्या करें. गुजरात में साढ़े चार हजार कोटा के लिए 40 हजार से अधिक आवेदन आते हैं. गुजरात का मुसलमान सुखी है. कच्छ व भरूच जिलों में मुसलिम अधिक हैं. गुजरात में अगर किसी जिले में अधिक प्रगति हो रही है तो वह है कच्छ व भरूच. लोगों की आंखों में धूल झोंका जा रहा है. लोग मूर्ख बना रहे हैं. गरीब हिंदू-मुसलिम आपस में नहीं लड़ना चाहते. वे गरीबी से लड़ना चाहते हैं. हम मिल कर गरीबी को परास्त करें. हमारी सरकार का मजहब है नेशन फस्र्ट, इंडिया फस्र्ट, भारत सबसे आगे. भारत का संविधान ग्रंथ है. भारत की भक्ति और शक्ति ही हमारी असली शक्ति है. बिहार के साथ देश में शांति और एकता को बनाये रखना है. ऐसा कोई काम नहीं करना है, जिससे बिहार की शान को चोट आये.
    भारत माता की जय.

शनिवार, 2 नवंबर 2013

दीपावली की शुभकामनाएं

बिग हिंदू की ओर से भारत वर्ष के सभी लोगों को दीपावल की हार्दिक शुभकामनाएं. आशा है आप सबों की दीवाली मंगलमय होगी.

शनिवार, 25 अगस्त 2012

अब तो बंद करें तुष्टिकरण


रोहित कुमार सिंह
15 अगस्त को एक खबर (अफवाह नहीं) चल निकलती है कि असम में बांग्लादेशी मुसलमान विरोधी दंगों के विरोध में पूरे द ेश में पूवरेत्तर के लोगों को निशाना बन ाया जा रहा है और ईद के बाद पूवरेत्तर के लोगों को मुसलमान काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं. खबर का असर हुआ और कर्नाटक व अन्य दक्षिणी राज्यों से पूवरेत्तर को जानेवाली ट्रेनों में भर-भर कर लोग पलायन करने लगे. देश एकाएक अराजकता की स्थिति में आ गया. देखा जाये  तो पूवरेत्तर के लोगों की चिंता गैर बाजिब नहीं थी. मुंबई के पुणो व झारखंड के रांची की घटनाएं साबित कर चुकी थी कि सबकुछ ठीक नहीं है और बदले की आग मुसलमानों में सुलग रही है. हालत बिगड़ता देख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आगे आते हैं और सबकुछ ठीक होने का दावा करते हैं और अफवाहों से बचने की सलाह देते हैं. इसके दो दिन बाद इस प्रकरण में केंद्रीय गृह सचिव का बयान आता है कि यह सबकुछ फेसबुक व सोशल नेटवर्किग साइटों द्वारा फै लायी गयी अफवाहों के कारण हुआ है. हालांकि सरकार उनकी सुरक्षा को लेकर पूरी तरह गंभीर है. इसके बाद विश्वास बहाली का दौर शुरू होता है व रूटीन चीजें दोहरायी जाने लगती हैं, लेकिन तभी एक खबर आती है कि पश्चिम बंगाल में ट्रेन से पूवरेत्तर के 18 लोगों को फेंक दिया गया है. चूंकि इस खबर को पूवरेत्तर के लोगों ने स्वयं घटते हुए देखा सो एक बार फिर दहशत कायम हो जाती है. कल तक पूवरेत्तर की सुरक्षा के नाम पर कसमें खा रहे हमारे देश के हुक्मरान बगले झांकने लगते हैं क्योंकि यह बात सामने आती है कि हजारों की संख्या में पलायन करते पूवरेत्तर के लोगों की सुरक्षा के लिए एक सिपाही तक मौजूद नहीं था.
हम पूवरेत्तर के साथ क्या कर रहे हैं
यह 15 अगस्त से 20 अगस्त के बीच की घटनाओं का सार है, जो हमारे सिस्टम पर सवाल-दर-सवाल खड़े करता है. पहला सवाल-हम पूवरेत्तर के साथ क्या कर रहे हैं. गृह मंत्रलय की रिपोर्ट कहती है कि देश में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और इससे बिहार के सीमावर्ती जिलों व पूवरेत्तर में धार्मिक समीकरण बिगड़ गया है. अल्पसंख्यक अब बहुसंख्यक हो गये हैं और कथित बहुसंख्यक अब अल्पसंख्यक कहे जा रहे हैं. इस बीच दिल्ली और गुवाहाटी में कई सरकारें आयीं और गयीं, पर किसी ने इस देश को स्थायी धर्मशाला बनने से नहीं रोका. पूवरेत्तर के 10 वैध लोगों के लिए दिल्ली से चला पैसा जब असम पहुंचता है तो उसके 100 नाजायज दावेदार हो जाते हैं. यह समस्या बढ़ती जा रही है. स्थानीय लोगों में रोष बढ़ता जा रहा है और कांग्रेस एंड कंपनी वोट बैंक को ध्यान में रख कर सबकुछ चुपचाप देख रही है.
खुफिया तंत्र केवल वीआइपी के लिए !
सरकार कह रही है कि पाकिस्तान ने साइबर क्राइम कर भारत का आंतरिक माहौल खराब किया. सवाल यह नहीं है कि किसने ़क्या किया. सवाल यह है कि जब पाकिस्तान आपकी आजादी के दिन दहशत बम फोड़ने में जुटा हुआ था तो सुरक्षा एजेंसियां क्या अचार लगा रही थी. यह बहुत आसान है कि आप अपनी गलतियों के लिए दूसरों को दोषी ठहरा दें, लेकिन बड़ी बात यह है कि इस मामले में कारगिल कांड की तरह हमारा खुफिया तंत्र फेल रहा. लगता है हमारा खुफिया तंत्र केवल वीआइपी की सुरक्षा के लिए ही सक्रिय होता है.
बोलने की आजादी पर पाबंदी
अब बात घटना के 10 दिन बाद की यानी 25 अगस्त की. सरकार ने कहा कि संघ परिवार व उसकी विचारधारा से जुड़े लोगों के ट्विटर एकाउंट बंद होंगे. इसके साथ ही बल्क एसएमएस भेजने पर पाबंदी जारी रहेगी. पाकिस्तान से जुड़ी साइटों व फेसबुक -ट्विटर को बंद करने अथवा ब्लॉक करने की बात तो समझ में आती है, लेकिन इस बहाने इसे धार्मिक रूप से बैलेंस करने यों कहें कि तुष्टिकरण के लिए संघ परिवार पर निशाना साधने की कार्रवाई तो निश्चय ही इमरजेंसी का दोहराव है. मैं इमरजेंसी के समय पैदा भी नहीं हुआ था किंतु जितना इसके बारे में पढ़ा या सुना उससे तो मुङो यही लगता है कि कांग्रेस ने शुरुआत तो कुछ ऐसे ही की होगी. देश की कांग्रेस सरकार कुछ भी कहे, वह बोलने की आजादी पर पाबंदी लगा रही है, वह इस आरोप से कतई बरी नहीं हो सकती है.

शनिवार, 18 अगस्त 2012

मोदी पर विवाद क्यों


15 अगस्त की दोपहर तक खबरों का बाजार ठंडा था. अचानक देश की प्रतिषिठत पत्रिका द वीक के हवाले से एक खबर निकली. इसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हवाले से कहा गया कि अगर भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तो वे गंठबंधन तोड देेंगे. बवाल मचा तो नीतीश कुमार ने इंटरव्यू से ही इनकार कर दिया. कहा-मैंने कोर्इ इंटरव्यू नहीं दिया और न ही नरेंद्र मोदी का नाम लिया. ऐसा नही है कि मामला पहली बार सामने आया है. नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी का नाम लिये बिना उनकी पीएम पद की उम्मीदवारी का विरोध कर रहे हैं. बीमारी वही है-देश में सेकुलर प्रधानमंत्री होना चाहिए, लेकिन सेकुलर की क्या परिभाषा है यह कोर्इ बताने को तैयार नहीं है. इस देश में सेकुलर का मतलब एक ही है-हिंदुओं की कीमत, हक पर मुसलमानों का तुषिटकरण करो. तभी तो प्रधानमंत्री भी यह कह गुजरते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है.
नरेंद्र मोदी पर निशाना साधनेवाले नीतीश कुमार यह भूल जाते हैं कि वे लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं. नरेंद्र मोदी भी इसी भारत के एक राज्य गुजरात के चुने हुए मुख्यमंत्री हैं. उन पर सवाल उठाना देश पर सवाल उठाने जैसा है.

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

गोधरा के शहीदों को श्ऱद्धांजलि

आज 26 तारीख है. 26 फरवरी. कुछ वर्ष पहले इसी दिन अयोध्या से लौट रहे कारसेवकों को गोधरा में दंगार्इ भीड ने जला दिया था. इस पर तमाम तरह की राजनीति हुर्इ. कहनेवाले तो यहां तक कह गये कि आग अंदर से लगायी गयी थी, बाहर तो लोग आग बुझाने के लिए जुटे थे. एक जनाब जसिटस बनर्जी ने तो अपने आकाओं की खुशी के लिए ऐसी बातों को एक रिपोर्ट तक की शक्ल दे दी. इस घटना को मुसलमानों ने अंजाम नहीं दिया है, इस बात को हर कीमत पर सही ठहराने के लिए सैकडों की संख्या में भांड जमा हो गये. कम्युनिस्टों की तो छोड ही दें, वे तो इसी काम के लिए बने हैं टुच्चे पत्रकारों की जमात भी इस कुकर्म में जुट गयी. इस घटना का स्याह पक्ष यह रहा कि पीडित समुदाय को न्याय मिलने की जगह उसे ही दोषी ठहरा दिया गया. सबको केवल मुसलमानों की चिंता रही, किसी ने हिंदुओं का दर्द नहीं जानेन की कोशिश की. लेकिन सच सच्चा सूरज होता सो उसने समय आने पर अपनी रोशनी दिखा दी. तमाम जांच के बाद यह स्पष्ट हो गया कि हिंदू जले नहीं जलाये गये थे. सचमुच यह केवल भारत में हो सकता है, जो हुआ भी. अब सच सबके सामने है. बिग हिंदू की ओर से गोधरा के शहीदों को श्ऱद्धांजलि व देश से गुजारिश-सच को सच कहने का साहस करें व तुषिटकरण का देश से उन्मूलन करें. तभी हमारे भारत वर्ष का कल्याण हो सकता है.

रविवार, 27 नवंबर 2011

कसाब सरकारी दामाद कब तक

26-11 की घटना को तीन साल पूरे हो चुके हैं. आतंकियों से निबटने की बात का क्या हुआ, सरकार ने क्या किया, जो घोषणाएं हुर्इं, उनका क्या हुआ इन सब बातों में मैंहमेशा की तरह नहीं जाना चाहता हूं. शायद इसलिए कि पत्रकारिता के चार वर्षों के अनुभव से मैं यह जान गया हूं कि हमारा सिस्टम बीती ताहि बिसार दे का मुरीद है और यह अपनी ही समस्याओं में इस कदर डूबा हुआ है कि आतंकवाद से निबटना इसकी प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे है. शायद यही वजह है कि कारगिल, मुंबर्इ, दिल्ली में धमाके झेलनेके बाद यह भावशून्य है. दरअसल, हजारों वर्षों की सांस्क्रतिक गुलाामी के बाद हममें विरोध नाम की कोर्इ चीज नहीं बची है. लेकिन मैं भी आदत से मजबूर हूं-जैसे ही खबर पढी कि माननीय कसाब पर अबतक 16 करोड रूपये खर्च हो चुके हैं, मन व्यथित हो गया, सोचने लगा कि क्या हमारे मेहनत की कमार्इटैक्स यही इज्जत होनी चाहिए. एक ऐसा आदमी जिसने हमारे देशवासियों को मारने में कोर्इ कोताही नहीं बरती, उसे हम दामाद की तरह तीन साल से बैठा कर उस जनता की कमार्इ खिला रहे हैं जो साल भर मेहनत-मजदूरी कर , समस्याओं में रह कर इस उम्मीद में सरकार को अपनी कमार्इ का हिस्सा देती है कि वह उसकी रक्षा करेगी. लेकिन हमारे हुक्मरान संविधान के प्रति लिये गये शपथ को भूल कर देश के दुश्मनों को पाल रहे हैं. यह बंद होना चाहिए. यह निशिचत ही बंद होना चाहिए.

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

आप सभी को छठ की शुभकामनाएं

बिग हिंदू की ओर से सभी शुभचिंतकों को छठ की शुभकामनाएं व बधार्इ

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

कार्टून का मतलब बताओ तो जानें


यह बिहार के एक युवा काटूनिस्ट की रचना है . उन्होंने इससे क्या संदेश देने की कोशिश की है, यह जगजाहिर है. मेरा मानना है कि अभिव्यकित की स्वतंत्रता के तहत उन्हें भी अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए , जिस तरह से देश के नेताओं को अपनी बात रखने का अधिकार है.

रविवार, 25 सितंबर 2011

7600 हिटस के लिए धन्यवाद

बिग हिंदू की ओर से 7600 हिटस के लिए सभी शुभचिंतकों को बधार्इ. आशा है आप अपना सहयोग इसी तरह बनाये रखेंगे.

आभार सहित

रोहित कुमार सिंह

बिग हिंदू

सोमवार, 19 सितंबर 2011

नरेंद्र मोदी ने ठीक किया

रोहित कुमार सिंह

भारत की सियासत में कुछ भी संभव है. नरेंद्र मोदी की सदभावना उपवास कार्यक्रम के अंतिम दिन सोमवार को टोपी विवाद को जिस तरह से हवा देकर इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गयी , उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस एंड कंपनी किसी सूरत में मोदी को बरदाश्त नहीं करना चाहती है.

पहले टोपी विवाद का पूरा वाकया पढें. मंच पर एक मौलवी साहब आते हैं, मोदी पूरी शिददत के साथ उनसे मिलते हैं, दोनों के बीच बातचीत होती है. अचानक मौलवी साहब अपनी जेब से एक इबादती टोपी निकालते हैंऔर मोदी को पहनाने की ख्वाहिश जाहिर करते हैं. मोदी आग्रहपूर्वक टोपी पहनने से इनकार कर देते हैं और एक चादर को स्वीकार कर मौलवी साहब को सम्मानपूर्वक विदा कर दिया.

जब मामले को कांग्रेस व सत्ता के सेकुलर दलालों द्वारा तूल दिया जाने लगा तो भाजपा की ओर से कहा गया कि टोपी इबादत के लिए होती है, लिहाजा टोपी पहनना अथवा न पहनना की भी रूप से राजनीति का अंग नहीं हो सकता है. मेरा भी व्यकितगत रूप से मानना है कि अपना धर्म किसी पर थोपना नहीं चाहिए, हर धर्म की अपनी मर्यादा व सीमा होती है, इसका उल्लंघन किसी भी सूरत में नहीं किया जाना चाहिए. पर इस देश में कांग्रेस की जो यूपीए है वह इन बातों से इत्तफाक नहीं रखती है. मेरा सवाल हो -हल्ला मचा रही कांग्रेस से है- क्या अगर मोदी टोपी स्वीकार कर लेते तो वह सेकुलर हो जाते, क्या बिना टोपी पहने मोदी ने जो आज तक गुजरात पर शासन किया है उसमें मुसलमानों का भला नहीं हुआ है, मोदी ने धर्म के नाम पर नाटक नहीं किया जो अमूमन सभी नेता करते हैं . पवित्र रमजान के समय हमारे नेता टोपी, पायजामा-कुरता, लाल या काली गमछी पहन-ओढ कर नमाजियों के संग एकता जताने के लिए जुट जाते हैं व उनके पवित्र रोजा खोलने को इफतार पार्टी बना डालते हैं. रमजान में नमाजी अल्लाह की इबादत में जुटे रहते हैं व एक शाम भोजन कर रोजा खोलते हैं , पर क्या हमारे नेता ऐसा करते हैं. वे तो दिन भर कम-कुकर्म कर शाम को भांड की तरह जाकर झूटी एकता जताने लगते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने से मुसलमान खुश होंगे व उन्हें वोट देंगे. अगर मोदी ने आग्रहपूर्वक टोपी लौटा दी तो कौन सा पहाड टूट पडा. कम से कम एक बात के लिए मोदी को शाबासी मिलनी चाहिए कि उन्होंने किसी के धर्म का अनादर नहीं किया.

बुधवार, 7 सितंबर 2011

माफ कर दें मनमोहन

एक ही बात बार-बार देश पूछते-पूछते थक गया है कि भर्इया मनमोहन आपकी आतंकवाद से लडार्इ कब शुरू होगी. जनाब आज के बम विस्फोट के बाद भी टीवी पर देशवासियों को अपने हिट बयान सुनाते दिखे. कितनी अजीब बात है कि जिस मुंबर्इ हमले मामले में बयानबाजी करने पर होम मिनिस्टर की कुर्सी चली गयी, उसी हमले के मुजरिम को देशवासियों के टैक्स के पैसों से ऐश कराया जा रहा है. बेशर्मी की हद यह है कि जिस संसद में ये भार्इ लोग देश को प्रवचन सुनाते हैं , उस पर हमले के आरोपित को ये लोग पाल-पोस रहे हैं. अगर कांग्रेस का आतंकवाद से लडने का तरीका यही है तो मनमोहन एंड कंपनी को देश को माफ कर देना चाहिए. उसकी आतंकवादियों से दरियादिली अब देश को भारी पड रही है. माना कि हमारे देश की आबादी 113 करोड के करीब है, लेकिन इसका यह मतलब कतर्इ नहीं है कि हम अपने कर्णधार को अपनी बलि चढाने के लिए खुद को सौंप दें. हमारे होम मिनिस्टर के साहस की बानगी देखिए-बाबा रामदेव के आंदोलन को दबाने के लिए जनाब को 12 बजे रात में पुलिस दमन कराने का दमखम आ जाता है, अन्ना हजारे को अनशन करने से रोकने के लिए स्वतंत्रता दिवस के एक दिन बाद गिरफतार कर लिया जाता है, पर उनकी सारी वीरता आतंकवादियों के आगे काफूर हो जाती है.

कांग्रेस के नरम रवैये का नतीजा है आतंकी हमला

राष्ट की सुरक्षा हर देश की सबसे बडी जिम्मेवारी होती है, पर लगता है कि आज कांग्रेस सरकार अपनी जिम्मेवारियों को भूल कर देश पर हमले के दोषियों-आतंकवादियों को ही सुरक्षा देने में लगी है, तभी तो अफजल गुरू व अजमल कसाब जैसे देश पर हमले के दोषियों को फांसी देने के बजाय अतिथि बना कर रखा गया है.

इकबाल इमाम

एक बार फिर देश की राजधानी आतंकी हमले से दहल गयी. दर्जन भर बेकसूर लोगों की जान गयी, 70 से अधिक लोग जख्मी हुए. आज सबसे बडा सवाल यह है कि बार-बार देश की सुरक्षा में सेंध क्यों लग जाती है़, आतंकी अपने मंसूबों में क्यों सफल हो जाते हैं, हमारा सुरक्षा तंत्र व खुफिया महकमा हर बार आतंकी हमले के बाद ही क्यों जागता है. इस बार अदालत को निशाना बनाया गया है. आतंकवादियों की मंशा साफ है. इससे तीन माह पूर्व भी वहीं हमला किया गया था. संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू व मुंबर्इ हमले के दोषी अजमल कसाब सहित दर्जनों आतंकवादियों को सजा सुनाये जाने के बाद भी अब तक फांसी नहीं दी गयी है. फांसी पर लटकाने के बजाय केंद्र की कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने इन आतंकवादियों को अतिथि बना कर रखा है. इस हमले की जितनी भत्र्सना की जाये, कम होगी. लेकिन इससे बढ कर उस कांग्रेस सरकार की भत्र्सना होनी चाहिए, जो देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड कर रही है. सभी जानते हैं कि अजहर मसूद के साथ क्या हुआ. एक यात्री विमान को हाइजैक कर अजहर सहित कर्इ आतंकवादियों को छुडा लिया गया. सवाल यह है कि क्या उस घटना से हमने कोर्इ सबक लिया, अगर नहीं लिया तो आखिर क्यों नहीं. क्या केंद्र की कांग्रेस सरकार , उसके मुखिया मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी चाहते हैं कि एक बार फिर आतंकवादी कोर्इ विमान हाइजैक करें और बदले में कसाब, अफजल व अन्य आतंकवादियों को सुरक्षित पाकिस्तान ले जाकर छोड दिया जाये, अगर ऐसा नहीं है तो केंद्र सरकार कडा रूख क्यों नहीं अपना रही है, क्यों देश की सुरक्षा के साथ आपराधिक लापरवाही बरती जा रही है, क्यों फांसी की सजा सुनाये जाने के बावजूद आतंकवादियों को दामाद की तरह रखा जा रहा है. जिस पाकिस्तान में वहां सरकार, सेना व आइएसआइ की मदद से भारत पर हमले के लिए आतंकी संगठनों को प्रशिक्षित किया जाता है , उसी पाकिस्तानी सरकार से बार-बार वार्ता करने, उस पर भरोसा करने, मुंबर्इ हमले में उसकी स्पष्ट भूमिका उजागर होने के बाद भी वहां आतंकवादियों के प्रशिक्षण केंद्रों को घ्वस्त नहीं करने और वहां की सरकार पर भरोसा करने की नादानी की गयी. दरअसल, यह नादानी नहीं, आपराधिक लापरवाही है . बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनों को बर्बरता से कुचलनेवाली कांग्रेस सरकार आतंकवादियों के प्रति नरम रूख अपना रही है. यह देशवासियों के साथ विश्वासघात है, जो शर्मनाक है.

---लेखक बिहार से छपनेवाले एक दैनिक में हैं.

कॉमन मैन की कार्रवाई

रोहित कुमार सिंह
देश का हॉल इन दिनों बहुत बुरा है. आतंकवादी-दर-आतंकवादी जेल में जमा होते जा रहे हैं और सरकार है कि उन्हें फांसी देने की सोच भी नहीं रही है. अब देखिये न सुना है दिल्ली हाइकोर्ट के बाहर कुछ धमाका-वमाका हुआ है. इसके आलावा नामुराद आतंकवादियों का जहां मन होता है, घुस आते हैं और तबाही मचा कर लौट जाते हैं. इधर, सरकार ऐसे "बिहेव' करने लगती है, मानो कुछ हुआ ही न हो. सरकार के मंत्री कहते हैं कि बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी घटनाएं हो जाती हैं. बताइए साहब, आदमी की जान की कीमत है कि नहीं. जब मंत्री महोदयों के साथ ऐसी "छोटी-मोटी' घटनाएं होंगी तो समझ में आयेगा कि जान की कीमत क्‌या होती है. इन्हीं सब बातों को लेकर मैं दिल्ली की सड़कों पर "चिंता' करते हुए घूम रहा था. सोच रहा था कि भगवान इस देश का क्‌या होगा. कैसे चेलगा खटोला . इतने में मुझे लगा कि कोई मुझे चिल्ला चिल्ला कर रुकने को कह रहा है. मुझे लगा कि इस "हस्तिनापुर' में मुझे जाननेवाला कौन हो सकता है. इतने मे मैंने देखा कि मुझे बुलानेवाला कोई और नहीं स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं. मुझे शंका हुई तो मैंने उन्हें इशारा कर पूछा कि कौन मैं? उधर से आवाज आयी-ओ हां यार तुम ही, रुको तो. मैं रुक गया. अब सामने मनमोहन सिंह थे. जब मैंने उन्हें प्रणाम किया तो उन्होंने कहा कि-अरे मैं कांग्रेस का कॉमन मैन हूं. कॉमन मैन मतलब आम आदमी. और जब मैं आम आदमी हूं तो ताकुल्ल्फ़ कैसी. मैं भारत की पदयात्रा पर अकेले निकला हूं. मुझे जानना है कि देशवासियों का दिन इन दिनों कैसे गुजर रहा है. मैंने सोचा कि अब मेरे सामने प्रधानमंत्री नहीं कॉमन मैन है, सो मौका बढ़िया है, दिल की भड़ास निकल ली जाये. तक ताकुल्ल्फ़छोड़ते हुए मैंने भी शुरू किया क्‌या कॉमन मैन की बात करते हैं. आज देश में जो कॉमन मैन की गत है, उससे तो ज्‌यादा मजे में सड़कों पर रहनेवाले आवारा कुत्ते हैं. कम-से-कम वे आतंक व महंगाई जैसी चीजों से बचे हुए हैं. आपके कॉमन मैन की हालत यह है कि घर के बाहर उसे आतंक का खौफ है तो घर के अंदर महंगाई का. बेचारा न जी रहा है, न मर रहा है. बीच में टोकते हुए मनमोहन सिंह ने कहा-यह आप क्‌या और कैसे कह रहे हैं. आतंक को रोकने के लिए हम लगातार लगातार लगातार पाकिस्तान के संपर्क में हैं, हमने आतंकियों की लिस्ट उसे सौंपी है. रही बात महंगाई की तो आप लगता है अपडेट नहीं हैं. महंगाई दर ऐसे गिर रही है, जैसे वह पहाड़ से फिशल गयी हो. मैंने भी उनकी बात काटते हुए कहा-लिस्ट सौंप दी तो कौन-सा बड़ा तीर मार लिया। लिस्ट को उसने बाथरूम पेपर के रूप में इस्तेमाल करफेेंक दिया. सभी जानते हैं कि आप 60 वर्षों से आतंकवाद-आतंकवाद चिल्ला रहे हैं, पर हो क्‌या रहा है-यह पूरा देश नंगी आंखों से देख रहा है. आतंकवादी हमें घर में घुस कर मार रहे हैं और आप अफजल व कसाब जैसों को जेल में पाल -पोस कर बड़ा कर रहे हैं. जहां तक महंगाई दर की बात है तो महंगाई दर तो गिर रही है, पर दाम जस-के-तस हैं. ऐसे में दर कैसे गिर रही है, इसकी तो सीबीआइ जांच करायी जानी चाहिए. मनमोहन सिंह ने छूटते ही कहा-देखो भाई युद्ध-वुद्ध से कुŸछ हासिल नहीं होगा. तुम जिस भाजपा की बोली बोल कर मेरे कानों में शीशा घोल रहे हो, उसी भाजपा से क्‌यों नहीं पूछते हो कि जब संसद पर हमले हुए तो उसने पाकिस्तान से भीड़ कर हिसाब बराबर क्‌यों नहीं कर लिया था. मैंने कहा-किसने क्‌या किया. इससे मुझे मतलैब नहीं है. आप अभी कुर्सी पर हैं, सो आप बतायें कि आप पाकिस्तान का क्‌या करनेवाले हैं. मनमोहन सिंह ने सफाई देनी शुरू कि मैंने गृहमंत्री को बदल दिया क्‌योंकि वे ज्‌यादा कपड़े बदला करते थे. पाकिस्तान को आतंकवादियों की सूची सौंप उसकी हमने पावती रसीद ली है ताकि बाद में हमें कोई यह न कहे कि हमने सूची सौंपी ही नहीं है. इसके अलावा हम पूरे विश्व को बता रहे हैं कि पाकिस्तान गंदा बच्चा है. बताइये यह कम है क्‌या. मनमोहन bole जा रहे थे, पर मुझे लगा कि भाई साहब सब बात करेंगे पर मुद्दे पर नहीं आयेंगे. उनसे विदा लेकर अपने प्रश्न पर सोचता आगे निकल गया।
(यह मेरी अप्रकाशित रचना है जो कुछ कारणों से अखबार या किसी पत्रिका में प्रकाशित नहीं हो सकी).....रोहित

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

आखिरकार युवराज ने मुंह खोला

रोहित कुमार सिंह

राहुल ने संसद में मुंह खोला तो कांग्रेस की आधिकारिक टिप्पणी देश को मिल गयी. जिस लच्छेदार तरीके सेराहुल ने लोकपाल के मुददे को किनारा करने की कोशिश की, उससे साफ है कि कल प्रधानमंत्री ने देश की संसद में झूठा बयान देकर देश को गुमराह किया था. राहुल का यह कहना कि लोकपाल से भी भ्रष्टाचार नहीं रूकेगा, यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस की समय लेकर बडे से बडे मुददे को रसातल में डालने की नीति खत्म नहीं होनेवाली है.

राहुल का पूरा बयान देखें
लोकपाल बिल के मुद्दे पर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने शुक्रवार को पहली बार अपनी राय सार्वजनिक तौर पर जाहिर की। लोकसभा में शून्‍य काल में इस मुद्दे पर बोलते हुए राहुल ने अन्‍ना के आंदोलन पर निशाना साधा। राहुल ने कहा, भ्रष्टाचार से लड़ना आसान नहीं है। प्रभावी लोकपाल भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सिर्फ एक हथियार भर है। सिर्फ इसी कानून से भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। मैं चाहता हूं कि चुनाव आयोग की तरह लोकपाल को संवैधानिक संस्था बनाया जाए। मेरे खयाल से लोकपाल भी भ्रष्ट हो सकता है।मैं चाहता हूं कि भ्रष्टाचार पर बहस का स्तर और ऊपर उठा दिया जाए।'

अन्ना के आंदोलन परकहा कि इस तरह के विरोध प्रदर्शन से खतरनाक परंपरा की शुरुआत होगी जो हमारी संसदीय प्रणाली को कमजोर करेगा। भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए नियम कानून जरूरी हैं। लोकसभा से निकलने के बाद संसद परिसर में जब राहुल गांधी से पूछा गया कि आप इतने दिन इस मुद्दे पर क्यों चुप थे? तो उन्होंने जवाब दिया कि मैं सोच समझकर बोलता हूं।

अगर यह राहुल की सोच -समझ कर कही गयी बात है तो यह अंदाजा लगाने लायक है कि राहुल की सोच का स्तर क्या है. राहुल को यह मानना होगा कि कम से कम कांग्रेस या स्वयं उनका जो स्टैंड है उससे भ्रष्टाचार का बाल भी बांका नहीं होगा.

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

एक र्इमानदार पीएम को यह करना चाहिए

रोहित कुमार सिंह

आज, गुरूवार को मैं प्रधानमंत्री को सुन रहा था. वे लोकपाल बनाम जनलोकपाल बिल पर अपना वक्तव्य दे रहे थे. पीएम मनमोहन सिंह शुरू हुए -मैं र्इमानदार हूं. मेरी संपतित की जांच करा ली जाये. मुझे मुरली मनोहर जोशी के भ्रष्टाचार की गंगोत्री बतायेजाने के आरोप से दुख हुआ है. मैंने देश को 20 वर्षों के राजनीतिक जीवन मेंजो भी हुआ , बेहतरी के साथ सेवा की. कुल मिला कर उन्होंने अपनी मजबूरी गिनायी, बेचारगी जतायी. माननीय प्रधानमंत्री जी ने सबकुछ बताया पर यह बताने से परहेज किया कि घोटाले दर घोटाले होते रहे, इस दौरान उनकी क्या भूमिका रही.

क्या पीएम साहब को इस बात से इनकार है कि ए राजा के खिलाफ सरकार तभी कार्रवार्इ के लिए आगे बढी, जब मामला कोर्ट-कचहरी में पहुंच गया. जबकि राजा के खिलाफ आवेदन सबूत के साथ दोवर्षों सेउनके पीएमओमें लावारिस पडा था.

इसमें कोर्इ दो राय नहीं है कि वे र्इमानदार हैंपर एक बात यह भी है कि उन्होंने राजधर्म का पालन नहीं किया. जिस देश में 300 करोड में बननेवाला स्टेडियम 3000 करोड बना, कौडियों के भाव टू जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस बांट कर ए राजा ने करोडों बनाये ,अरबों का आदर्श सोसाइटी घोटाला हुआ, उस देश के प्रधानमंत्री इस्तीफा देकर संसद से बाहर क्यों नहीं है, यह सबसे बडे आश्चर्य की बात है. प्रधानमंत्री ने अपनी सब बातें बतायीं पर प्रधानमंत्री बने रहने की मजबूरी नहीं बतायी. मैं क्या पूरा भारत उसे नंबर वन र्इमानदार मानता है पर ऐसी र्इमानदारी किस काम की, जो देश के लिए किसी काम की नहीं हो. यह एक दिन की बात नहीं है. यूपीए 1 की सरकार में वोट फार नोट कांड हुआ, र्इमानदारी का तकाजा तो यही बनता था कि पीएम मामला आते ही इस्तीफा देकर किनारे हो जाते. क्या प्रधानमंत्री ऐसा करेंगे, अगर पीएम ऐसा करते हैं तो जिस उच्च लोकतांत्रिक की बात हमारे देश में होती है अथवा कांग्रेसी करते हैं वह एक बार फिर स्थापित होगी.

वंदे मातरम, भारत माता की जय

सोमवार, 22 अगस्त 2011

सही में राहुल गांधी कहां हैं

रोहित कुमार सिंह

अन्ना के आंदोलन का आज छठा दिन है. तिहाड जेल से लेकर रामलीला मैदान तक देशभकित नारों की धूम इन दिनों देखने को मिली. इन्हीं नारों में एक सवाल पूछा जा रहा है कि देश का युवा यहां है, राहुल गांधी कहां है. 70 साल के अन्ना हजारे के एक आहवान पर देश का युवा वर्ग सडकों पर है, ऐसे में यह सवाल तो जायज ही है कि स्वयं को युवाओं का कर्णधार बतानेवाले राहुल गांधी कहां हैं. शनिवार को इस युवा राहुल गांधी से प्रेस ने पूछने यह पूछने की कोशिश की कि अन्ना के आंदोलन के बारे में आपकी क्या राय है. इस पर इस कथित युवा तुर्क ने अपने होंठ सिल लिये. ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी संकट के पहले मौके पर चुप रहे हैं. इससे पहले भी कर्इ मौके पर वे अपनी चुप्पी दिखा चुके हैं. चाहे कालाधन का मुददा हो या फिर भ्रष्टाचार से निबटने का मामला या फिर लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाये जाने का मामला. राहुल ने अपनी चुप्पी से दिखा दिया कि देश की जनता की समस्याओंसे उन्हें कोर्इ मतलब नहीं है.

दरअसल राहुल की राजनीति की इंटर्नशिप चल रही है. वे कभी से राजनेता नहीं हैं. उन्हें गरीबों के घर नाइट हाल्ट करने व उनके नंगे -भूखे बच्चों के साथ फोटो खिांचाने में ही बहादुरी दिखती है. क्या राहुल ने कांग्रेस से पूछने की कोशिश की है कि 60 साल के आजाद भारत में उसने कैसे शासन किया कि देश की यह हालत हो गयी. किसानों की बात करनेवाले राहुल उनके मुददों के साथ मेडिकल इंटर्न स्टूडेंट की तरह ही बिहेव कर रहे हैं. अन्ना का आंदोलन राहुल गांधी के लिए यह मौका है कि वह अंगरेजों की नाजायज औलाद कांग्रेस से पिंड छुडा कर या कहें तो अपना मोह त्याग कर देश की आवाज के कार्यकर्ता बनें व युवाओं के इस आंदोलन से जुडें अगर वे ऐसा करते हैं तो देश की जनता उन्हें माफ कर देगी . क्या राहुल ऐसा कर सकते हैं़?????